*फोरम आफ बैंक पेंशनर एक्टिविस्टस्
Forum of Bank Pensioner Activists
PRAYAGRAJ
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्रणिनामार्तिनाशनम्॥
हिमालयं समारभ्य, यावत् इंदु सरोवरम्।
तं देवनिर्मितं देशं, हिन्दुस्तानं प्रचक्षते।।
सभी एक्टिविस्ट्स के लिए:
बैंक पेंशन योजना आज सबसे विवादास्पद और चर्चा का विषय है, निस्संदेह ज्यादातर गलत कारणों से। हमें नहीं लगता कि बैंकिंग बिरादरी ने कभी किसी समझौते की इतनी गहराई से जांच की है, जितनी वे पेंशन नीति की जांच कर रहे हैं। इसका एक कारण यह है कि 1.1.1986 से इसके लागू होने के बाद से इसे कभी भी परिमार्जित नहीं किया गया है, बुरी तरह थोड़ा-मरोड़ा गया, इसकी हैसियत कमजोर की गई। हम जानते हैं, अगर यह परिमार्जित होती, संवर्धित होती तो लोगों को इसे बरदान मानते रहते। इस लेख में, फोरम ने पेंशन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को, जैसे थे/ जैसे हैं, समझने की कोशिश की है। यदि यह उपयोगी लगे, तो साइबर कैफे से प्रिंट आउट लें और इसे अपने पेंशन संबंधी कागजात के साथ रखें।
(प्रयागवाणी, प्रयागराज)
27.5.2022, 9559748834
पेंशन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि:
1 अप्रैल, 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना होती है। यह देश का केन्द्रीय बैक है। इसका पूर्ण स्वामित्व भारत सरकार का है। यहां के कर्मचारियों/अधिकारियों के लिए कोई पेंशन नीति नहीं थी। 1 जुलाई, 1955 को इंपीरियल बैंक आफ इंडिया का भारत सरकार ने अधिग्रहण करते भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना की। चूंकि इंपीरियल बैंक में पेंशन नीति थी, अत: भारतीय स्टेट बैंक के बनने पर यह नीति बरकरार रही। इलाहाबाद बैंक में भी पेंशन के नाम पर प्रावधान था, लेकिन यह बहुत कमजोर थी, अत: पेंशन रिगुलेशंस, 1995 बनने के बाद लोगों ने पुरानी पेंशन छोड़ते नई पेंशन का विकल्प चुना। स्टेट बैंक की पेंशन सीपीयफ लाभ के साथ बनी रही। स्टेट बैंक में पेंशन भी है और सीपीयफ भी है। यह स्टेट बैंक की विशिष्ट स्थिति है, जो बावजूद तमाम अड़चनों के न केवल बरकरार है, बल्कि उसे समय समय पर संवर्धित भी किया। यह वह विशिष्ट स्थिति है, जो रिजर्व बैंक या अन्य बैंकों के कार्मिक हासिल नहीं कर सके।
1985 के आसपास रिजर्व बैंक में पेंशन की मांग उठी और यह धीरे धीरे आंदोलन में बदल गयी। अन्य बैंकों को लेकर, ए.आई.बी.ई.ए. ने भी इस मांग को उठाया और यहां भी यह आंदोलन में बदल गयी। यहां कई यूनियनें और भी थी। स्टेट बैंक की यूनियन भी थी, जहां पेंशन पहले से था। यहां रिजर्व बैंक की तरह स्थिति साफ नहीं थी। अत: पेंशन को लेकर सबसे बड़ी अडचन इसे तीसरे लाभ के रूप में हासिल करने की थी। सभी विरोधी यूनियनें इस बात को लेकर एकमत नहीं थीं। स्टेट बैंक को डर था कि यदि पेंशन सीपीयफ की एवज में आती है तो उसे सीपीयफ खोना पड़ सकता है। ऐसे में इसका पूरा जोर पेंशन को तीसरे लाभ के रूप में पाने का था, जो असंभव था। 1990 आते-आते रिजर्व बैंक में यह मुद्दा सहमति पर पहुचा। पेंशन दूसरे लाभ के रूप में तय हुई। लोगों को विकल्प दिया गया कि वे सीपीयफ के साथ बनें रहें या उसे छोड़ते पेंशन का विकल्प चुनें। 1992 में नाबार्ड में भी रिजर्व बैंक जैसी नीति बन गई। अब ए.आई.बी.ई.ए. के सामनें रास्ता साफ था कि वह फैसला ले और रिजर्व बैंक के रास्ते पर चले। अन्य यूनियनें खासकर एन.सी.बी.ई. जो स्टेट बैंक के अलावा अन्य बैंकों में कुछ प्रभाव रखती थीं तथा कुछ बैंकों की स्वतंत्र यूनियनों ने पेंशन नीति को पूर्णतया अलाभकारी करार देते, उसके विरोध पर उतर आईं। तरह-तरह की गणनाएं सर्कुलेट हुईं। ए.आई.बी.ई.ए. के नेताओं को भ्रष्ट करार देते, उनके खिलाफ चरित्र हनन करते पोस्टर लगे। इन सबकी परवाह किए बिना, ए.आई.बी.ई.ए. ने 29.10.1993 को आईबीए के साथ अकेले समझौता किया और इस तरह पेंशन रिगुलेशंस, 1995 का रास्ता साफ हुआ। बाद में सभी यूनियनों ने इसको इंडोर्स किया। बेफी अंतिम संगठन था, जिसनें यूयफबीयू के साथ वार्ता टेबल में शरीक होने के लिए आईबीए की पूर्वशर्त के कारण पेंशन नीति पर हस्ताक्षर किया।
तथ्यात्मक विवरण:
1. पेंशन रिगुलेशंस, एक सहायक लेजिसलेशन है:
बैंक इम्प्लाइज पेंशन रिगुलेशंस, 1995, बैंकिंग कंपनीज ( अक्वीविशन एंड ट्रांसफर आफ अंडरटेकिंग्स) एक्ट,1970/80 में बैंकों के बोर्ड को प्रदत्त अधिकारों के तहत बनाया गया एक सबार्डिनेट लेजिसलेशन है, जिसमें 29.10.1993 के समझौते की सभी शर्तें समाहित हैं। रिगुलेशंस वैसा ही है, जैसा भारतीय रिजर्व बैंक पेंशन रिगुलेशंस, 1990 हैं। इसको लेकर किसी तरह के भ्रम की गुंजाइश नहीं है।
2. बेबुनियाद अफवाहों से सावधान रहें:
पेंशन रिगुलेशंस में पेंशन अपडेटिंग क्लाज न होने को लेकर तरह-तरह की बेबुनियाद बातें होती हैं। बुनियादी बात यह है कि 29.10.1993 के समझौते ले लिखा हुआ है कि अपडेटिंग सहित सारे नियम और शर्तें रिजर्व बैंक पेंशन रिगुलेशंस की तरह होंगी। अत: जब रिजर्व बैंक पेंशन रिगुलेशंस में कोई अपडेटिंग क्लाज नहीं था या है, तो अन्य बैंकों के मामले में यह कैसे होता। अतः हमारे पेंशन रिगुलेशंस, 1995 में अपडेटिंग क्लाज नहीं था/है।
3. अपडेटिंग क्लाज न रिमूव न ड्राप, सबकुछ रिजर्व बैंक पेंशन जैसा:
पेंशन की पात्रता, कतिपय शर्तों के साथ, 1.1.1986 से हुई, क्योंकि ऐसा हमारे से पहले रिजर्व बैंक, नाबार्ड में भी हुआ था। कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि पेंशन 1.1.1986 से लागू करनें की एवज में अपडेटिंग क्लाज हटा दिया गया। यह क्लाज था ही कब कि हटा दिया गया? किसी भी शर्त का होना या न होना, पेंशन समझौते के क्लाज 12 के तहत, रिजर्व बैंक की पेंशन नीति से जुड़ा था।
4. निश्चित अवधि के लिए अपडेटिंग, यह क्लाज निर्धारित समय तक सीमित:
पेंशन रिगुलेशंस, 1995 में 1.1.1986 से, 31.10.1987 की पेंशन की अपडेटिंग एक फार्मूले के तहत हुई, जैसा आरबीआई में भी हुआ था। इससे संबंधित क्लाज का दायरा उपरोक्त समय के लिए था। उससे केवल यह स्थापित होता है कि अपडेटिंग की भावना रिगुलेशंस में अंतर्निहित थी। लेकिन, इससे स्वयमेव अपडेटिंग का अधिकार नहीं निकलता।
5. पेंशन रिगुलेशंस एक स्वतंत्र रिगुलेशंस है, वेतन समझौतों से इसका कोई संबंध नहीं था, पर आईबीए-यूनियनों की मिलीभगत से इसकी स्वतंत्रता, स्वायत्तता समाप्त हुई;
पेंशन रिगुलेशंस, 1995, वेतन समझौते से अलग एक स्वतंत्र सेवा रिगुलेशंस है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इसे अलग से उठाया गया, लड़ा गया, चर्चा की गई और विशेष प्रक्रियाओं के माध्यम से निपटाया गया, जो पूरी तरह से वेतन पुनरीक्षण समझौतों से अलग था। आरबीआई में भी ऐसा ही हुआ। आरबीआई में यह अब तक अलग मुद्दा बना हुआ है। लेकिन, हमारे मामले में, आईबीए ने बहुत चालाकी से पेंशन को वेतन पुनरीक्षण समझौते में विनियम, 1995 के तुरंत बाद, खींच लिया था, जो स्पष्ट रूप से हानिकारक उद्देश्यों के लिए 7वें समझौते से हुआ। .
इसकी फंडिंग, परिचालन, नियम आदि की व्यवस्था का रिगुलेशंस, 1995 में स्वतंत्र प्रावधान है। वेतन वृद्धि समझौतों से पेंशन फंडिंग का कोई प्रावधान रिगुलेशंस में नहीं है। क्लाज 7 का ए से एच तक देखा जा सकता है। देखिए, कैसे आईबीए ने काम करने वाले बैंक कर्मचारियों/अधिकारियों को यूनियनों के मौन समर्थन से 7वें समझौते से वेतन भार से कुछ राशि का दुरुपयोग करने के लिए धोखा दिया।
6. आईबीए ने पेंशन को वेतन समझौते में घसीटा, बड़ी गलती जो यूनियनों ने होने दिया, पेंशन घटी और वेतन भी!
आईबीए नें बड़ी चालाकी से, 7वें वेतन समझौते की वार्ता के दौरान, पेंशन फंडिंग को वेतन भार से जोड़नें में कामयाब हो गया। इस पर यूनियनों ने सहमति ही नहीं दी, बल्कि वेतन वृद्धि से होने वाली पेंशन वृद्धि को रोकने के लिए, 1616/1684 सूचकांक के दो वेतन मान बनाने पर भी सहमति दी। यहीं से वेतन वृद्धि से पेंशन फंडिंग का नया श्रोत निकलता है। यहीं से स्वीकृत वेतन लोड से पेंशन फंड के अतिरिक्त फंडिंग को समायोजित किया जाने लगा। पेंशन रिगुलेशंस, 1995 में वेतन लोड से पेंशन फंडिंग का ऐसा कोई प्रावधान आज तक नहीं है। क्लाज 7 का ए से एच तक देखें। 1616/1684 का प्रावधान वस्तुतः पेंशन कम करने का यूयफबीयू का यह पहला कदम था। दूसरा, पेंशन भार के नाम पर बड़ी राशि का स्वीकृत वेज लोड से समायोजन पर यूनियनों की सहमति का प्रतिकूल असर वेतन पुनरीक्षण पर पड़ा। पेंशन घटी और वेतन वृद्धि भी कम हुईं। यह दोहरी मार रिटायरीज और सेवारत लोगों को भोगना पड़ा। यह क्रम 7वें से 11वें समझौते तक जारी है। इससे वेतन वृद्धि कमजोर होती रही है, पेंशन 50% से घटती रही है।
7. अबरेशन 4/1998- 4/2005 तक जारी रहा, प्रभावित हुए लोग सर्वोच्च न्यायालय गये:
8वें समझौते में 1616/1684 को अबरेशन (aberration) करार देते 1.5.2005 से आगे के लिए ठीक किया गया। इससे अप्रैल, 1998 से अप्रैल, 2005 के बीच के प्रभावित सेवानिवृत्तियों को छोड़ दिया गया। आक्सफोर्ड शब्दकोश में अबरेशन का मतलब, "कोई तथ्य, कार्य या व्यवहार जो सामान्य से हटकर हो और जो अस्वीकार्य हो सकता हो" बताया गया है। यह तथ्य और व्यवहार से हटकर कृत्य था, अतः अवांछनीय मानते अस्वीकार हुआ। ऐसे में यह पिछली तारीख से क्यों नहीं किया गया, एक बड़ा सवाल था। इस विपथन से हजारों लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा और न्याय के लिए सर्वोच्य न्यायालय तक जाना पड़ा। यूनियनों ने न मदत किया और न कभी हस्तक्षेप। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करनें में आईबीए/ बैंकों ने अनेक अड़चनें पैदा की, लेकिन यूनियनों ने किसी स्तर पर ऐसे लोगों की मदत नहीं की। यह यूनियनों का प्रतिशोधात्मक रवैया अपने पूर्व साथियों के साथ अमानवीय और निंदनीय था, लेकिन किसी यूनियन या उसके नेता को कभी कोई शर्मिंदगी नहीं हुई।
8. पेंशन का दूसरा विकल्प आईबीए की शर्तों पर, बड़ी कीमत का घटिया सौदा, यूनियनों ने पुरानी पेंशन को सोने की तश्तरी में लौटाया:
नौवें समझौते में, पेंशन का दूसरा विकल्प एक बड़ी कीमत चुका कर मिला। इसके लिए यूनियनों ने सर्व प्रथम पुरानी पेंशन नीति को समाप्त करते, एन.पी.एस. के लिए आईबीए के प्रस्ताव को स्वीकार किया और दूसरा कि पेंशन रिगुलेशंस, 1995 की शर्तों से इतर दूसरे विकल्प के लिए आईबीए की एकतरफा नईं शर्तों को भी स्वीकार किया। मसलन, रिगुलेशंस, 1995 में 1.1.1986 से 1 नवंबर, 1993 से पूर्व रिटायरीज को पेंशन पात्रता दी गई थी। ऐसे लोगों को पेंशन के लिए पी.यफ. का बैंक अंशदान ब्याज सहित, जो लोगों को सेवानिवृत्ति पर मिला था, उसे 6% साधारण ब्याज के साथ वापस करना था और पेंशन सेवानिवृत्ति के अगले महीने से लागू कर दी गई थी। दूसरे विकल्प में इसे उलट दिया गया। दूसरे विकल्प के लिए, सेवानिवृत्तियों को बैंकों के पी.यफ. योगदान व ब्याज के साथ साथ एकमुश्त बड़ी अतिरिक्त राशि वापस करनी पड़ी और उन्हें पेंशन सितंबर, 2009 से मिली, अर्थात सेवानिवृत्ति के अगले माह से नहीं। इस तरह हर विकल्पी को सितंबर, 2009 के पूर्व रिटायरी महीनों/ वर्षों की पेंशन गवानीं पड़ी। इसके अलावा, दूसरे विकल्पी जो तब भी सेवा में थे, उनसे भी दूसरे विकल्प के लिए एकमुश्त एक राशि वसूली गई, जो अपनें आप में यूनीक कहा जा सकता है। पेंशन के पहले विकल्प के साथ ऐसा कुछ भी नहीं वसूला गया था। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन था? लोगों नें 1995 में पेंशन विकल्प, किसके कहने पर ठुकराया था? ये उनकी अपनीं यूनियनें और उनके अपने नेता थे, जो उस समय पेंशन बाइकाट करने का अभियान चला रहे थे और पेंशन को एक ले डूबने वाली नीति बता रहे थे। इस शर्मनाक स्थिति और घटिया सौदे के लिए यूयफबीयू की यूनियनें जिम्मेदार हैं। पुरानी पेंशन एक कानूनी एग्रीमेंट के तहत थी, जिसे सोने की तश्तरी में सजाकर यूनियनों ने आईबीए को सौंप दिया। एनपीएस पाना आईबीए की मजबूरी थी और दूसरा विकल्प पाना यूनियनों की। आईबीए अपनी मांग फ्री में ली और यूनियनों की मांग की भारी कीमत वसूलु।
9. स्पेशल एलावंस से, पेंशन कटौती फिर पिछले दरवाजे से घुसी, पेंशन 50% से 45.5% हुई
10वें समझौते में 7वें समझौते की पेंशन कटौती नीति की पिछले दरवाजे से पुनरावृत्ति होती है। वेतन वृद्धि से पेंशन वृद्धि न हो या कम से कम हो, इसके लिए 1.11.2012 से मूल वेतन का 7.75% से 11.5% तक काटकर उसे स्पेशल एलावंस बनाया गया, जिसे पेंशन गणना से बाहर कर दिया गया। यह अचानक हुआ, चोरीछिपे हुआ। यह आईबीए का छुपा एजेंडा बड़ी यूनियनों की छुपी सहमति पर था। हल्ला हुआ, लेकिन एक बार जब समझौता हो गया तो उसे कौन पलट सकता है, खास कर तब जब बड़ी यूनियनों की सहमति हो। कहा, अगले समझौते में ठीक हो जाएगा। लोग भी झांसे में आ गये। सोचा, जैसे 1616/1684 हट गया था वैसे ही यह स्पेशल एलावंस भी 11वें समझौते में मूल वेतन में मिला दिया जाएगा। लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
10. स्पेशल एलावंस मूल वेतन में मिलाने के बजाय, 16.4% किया गया, पेंशन घटकर 41.8% हुई
11वें समझौते के मांगपत्र में स्पेशल एलावंस को मूल वेतन में मिलानें की मांग रखी गई। लोग पूर्णरूप से आश्वस्त थे कि स्पेशल एलावंस मूल वेतन में विलीन होगा। वार्ता के अंतिम दौर में एकाएक स्पेशल एलावंस विलय की बात हवाहवाई हो गई। यूनियनें इसे 20% करने को लेकर आपस में भिड़ गई, क्योंकि अधिकारी यूनियनों ने इसे 16.40% करने पर सहमति दे दीं थीं। सबको मालूम था, इसका प्रतिकूल असर पेंशन पर पड़ता है, लेकिन कर्मचारियों की सबसे बड़ी यूनियनें नंगी होकर 20% स्पेशल एलावंस करने पर टकराव पर उतर गईं, हलांकि वे सफल न हो सकीं। इस तरह 1.11.2017 से पेंशन 50% से घटकर 41.80% हो गई।
11. रिजाइनीज की पेंशन को नजरंदाज किया, बड़ी नाइंसाफी, लेकिन यूनियनें चुप !
विनियम, 1995 में इस्तीफे, बर्खास्तगी, हटाने या सेवा समाप्ति के मामले में, को पेंशन को क्लाज 22 के तहत जब्त कर लिया गया था। हालांकि, एक विशिष्ट बैंक के एक विशिष्ट रिमूवल मामले में, माननीय सुप्रीम ने रिमूवल को गलत ठहराया था। आईबीए ने उक्त निर्णय पर विचार किया और सभी बैंकों के ऐसे सभी मामलों को निर्णय का लाभ देने की सलाह दी। न केवल रिमूवल, बल्कि बर्खास्तगी, टर्मिनेशन और सीआरएस मामलों पर भी विचार करनें और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का लाभ देनें को कहा, क्योंकि आईबीए की नजर में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय क्लाज 22 को लेकर था। यदि फैसला क्लाज 22 को लेकर था, तो क्लाज 22 में ही रिजाइन्ड लोग भी हैं, उनका क्यों नहीं किया गया? आईबीए की मनमानी देखिए, जहां उसने ऐसे सभी दागी लोगों के मामले में उदारता बरती, पेंशन का लाभ दिया, जिन्हें स्पष्ट रूप से उनके कुछ कदाचार के लिए बैंकों से बाहर कर दिया गया था, वहीं पर मुठ्ठीभर 'इस्तीफा देने वाले' मामलों को छोड़ दिया, जिन्होंने निश्चित रूप से अपने नियंत्रण से परे कुछ परिस्थितियों में नौकरी छोड़ी होगी। यूनियनें विशिष्ट चुप्पी साधे रहीं हैं और आईबीए बेपरवाह है।
12. क्षति प्रतिपूर्ति में भेदभाव जारी, समान प्रतिपूर्ति के विधिक अधिकार पर अनैतिक प्रहार, यूनियनें सहमत आज भी सहमत हैं:
बैंकिंग जैसे उद्योग में यह अनूठी विशेषता है, जहां क्षतिपूर्ति में बड़ा भेदभाव होता है। देखिए, महंगाई का मुआवजा डीए है। 2002 से पहले के सेवानिवृत्त लोगों को अन्य पेंशनरों और काम करने वाले बैंककर्मियों की तरह 100% डी.ए. नहीं दिया जा रहा है। काम करनेवालों के लिए डीए को, सीपीआई के त्रैमासिक औसत पर बढ़ाया या घटाया जाता है, लेकिन पेंशनरों के मामले में यह छह मासिक आधार पर किया जाता है। यह देश के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ है कि एक स्थापना/संस्था में मुआवजे के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते हैं। 2002 से पहले सेवानिवृत्त लोगों ने एससीआई में 100% डीए का मामला हार गये, क्योंकि उनका वकील पेश नहीं हो सका। अब, IBA, UFBU इस दलील को अपने सीने से लगाए घूंम रहे हैं। यह बैंकिंग में खेदजनक स्थिति है जहां तथाकथित शक्तिशाली यूनियनें मौजूद हैं।
13. अपडेटिंग का मतलब, संपूर्ण पेंशन नीति का CCSR के आलोक में पुनरावलोकन और अपेक्षित सुधार:
पेंशन अपडेटिंग का अर्थ पेंशन का निश्चित अवधि के मूल वेतन के समकक्ष लाना है, मूल पेंशन को अपग्रेड करना है। इसका अर्थ है 1995 के बाद CCSR में हुए सुधारों के आलोक में बैंक पेंशन के नियनों में सुधार। सुधार, जैसा कि 1995 के बाद सीसीएसआर में किया गया हो। अद्यतन करने का अर्थ है, पेंशन योजना के सभी नियमों और शर्तों का व्यापक दृष्टिकोण और उन्हें सीसीएसआर स्तर पर पुन: लाना । अपडेटिंग का मतलब डी.ए. का 100% न्यूट्रलाइजेशन के साथ साथ पेंशनरों को भी कार्यरत लोगों की तरह हर तिमाहीं में इंडाइसेज के आधार पर डी.ए. का समायोजन।
14- 1998-2022 का कालखंड पेंशन डिस्टोर्शन का,आईबीए-यूनियनों की मिलीभगत का शर्मनाक सीरियल..
यूनियनों की शर्मनाक हरकत के कारण, पेंशन कभी वेतन और सेवा शर्तों का अभिन्न अंग नहीं बन सकी। खुद यूनियनों ने कभी इसे प्रमुखता नहीं दी। मांगपत्र के किसी कोनें में डाल दिया। जब कि मांगपत्र की पहली लाइन- 'वेतन, भत्ते, पेंशन और सेवा शर्तों में सुधार- होना चाहिए था, पर कभी ऐसा लिखा नहीं।1998 से अभी तक का दौर 50% पेंशन के मूल अधिकार को तरह-तरह से कम करने, कमजोर करने तथा पेंशन के दूसरे विकल्प को बड़ी कीमत के बदले हासिल करनें का था। पेंशन रिवीजन की मांग को मांगपत्रों में डाल कर यूनियनों ने आईबीए को ब्लैकमेल करने का उपक्रम बनाया, जो बेकार साबित हुआ। आईबीए को कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपने मनमुआफिक समझौते हासिल करता रहा। पेंशन रिवीजन पर दबाव न देने की एवज में पता नहीं यूनियनों को क्या हासिल हुआ? इस बात का कोई जवाब नहीं है कि 2013 में एआईबीइए के महामंत्री या फिर 2018 में एबाक के महामंत्री ने बिना पेंशन रिवीजन के क्रमशः 10वां व 11वां समझौता हस्ताक्षरित न करने के एलान कैसे और क्यों किया था! दोनों लफ्फाजी कर रहे थे, बैंककर्मियों को बेवकूफ बना रहे थे, क्योंकि जब आरबीआई में पेंशन रिवीजन नहीं हुआ था, तो अन्य बैंकों के रिवाईज होने का सवाल ही नहीं था। दोनों झांसा दे रहे थे। इनका पर्दाफाश तब होता है, जब मार्च, 2019 में आरबीआई की पेंशन रिवाइज होनें के बावजूद सब यूनियनें सन्नाटे मे चलीं जाती हैं, किसी तरह वेतन समझौता कर पतली गली से निकलनें का निर्णय लेती हैं। यह एक काला चिठ्ठा है, बैंकिंग यूनियनों का, जो अपनें को ट्रेंड सेटर होनें का दंभ भरती है। यह जीता जागता उदाहरण है, पेंशनर्स को धोखा देने का, जो यूनियनों के निर्माता लोग है। लाखों बैंक पेंशनर्स पेंशन रिवीजन न होने से आर्थिक विपन्नता के शिकार हैं। हजारों की मौत हो चुकी है।
15. अंत में, यह सब ठीक नहीं है:
पेंशन रीवीजन की कौन कहे, इन्हें पेंशनरों के प्रति दो सहानुभूति के शब्द रास नहीं आये। वित्तमंत्री जान चुकीं थीं कि बैंक पेंशनरों को उनकी हाल पर छोड़ते, यूनियनें वेतन समझौता कर खिसकने वालीं हैं। मामला द्विपक्षीय होने के बावजूद, वित्तमंत्री नें साहस दिखाया, हस्तक्षेप किया। यह हस्तक्षेप यूनियनों के गाल पर जोर का तमाचा था, जिसे पड़ते ही यूनियनें तिलमिला गईं। क्या कोई यूनियनों से जान सकता है, वित्तमंत्री ने क्या गलत किया? पेंशनरों का गुनाह क्या था? उनके योगदान को कैसे भुलाया जा सकता है? उनको उनकी हाल पर कैसे छोड़ा जा सकता है। उन्हें उनके पेंशन रिवीजन के हक से वंचित कैसे किया जा सकता है? यूनियनें अपनें पूर्व सदस्यों , जिन्होंने यूनियनों को बनाया, सफलता दी, के प्रति हरामखोर कैसे हो सकतीं हैं? नेता हरामीं कैसे हो सकते है? ऐसे सवालों को सीने पर टांग कर बैंक पेंशनर्स वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहा है। (समाप्त)
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